मंथन
मंथन धन भी काला मन भी काला बहता है जो आज नदी में छिना था कल जिसने निवाला रात अंधेरी थी कलतक ये अब भाग दबाकर देख उजाला लाथ पड़ी जब मांगी रोटी दहेज़ अधुरा जली थी बेटी खाद बिना जब करी थी खेती फांस लगाकर मारा कर्ण था अब चाटे मिटटी पैसे वाला ना छुटा भगवन भी उसने द्वारे पर नंगा नचवाया काले धन से भरकर कुण्डी स्वर्ण से मदिर बनवाया दान समज न आने वालो अब जाकर के घुटको हाला ? पैसे कि न जात कभी थी न था कोई ज्ञान निराला जो पाए सज्जन कहलाता ना पाए न पाता आटा भूक ही चोरी करवाती थी रोक न पाता अल्लाताला अब तो होगा सब पवन ? या फिरसे होगा कोरा छाला अब धनीराम ढुॅंडे है राहे सोने मे पैसा छिपवाने कंलक सा है मानवता पर आज जो बांटे कलका काला मंथन है यह सभी पिसेंगे नेता भगवन सभी घीसेगे दान कुंड भी खाली होंगे वोट खरीदे बेचे जिसने आज सूखा उनका प्याला सजग रहो रे सज्जन जन अब बाटेगा कल लेनेवाला लेना मत कोयी धन वैसा कर्म मार्ग ही है मतवाला जय सच्चाई जयोस्तु उजाला - अजय निंबाळकर