भारतका अमृतमंथन
भारत का अमृतमंथन
लाखों ने हमको लूटा था
अंग्रेज़ों ने भी बाँटा था
सोने की चिड़िया थे हम भी
सब चला गया बस घाटा था
हर नर नर में डर बैठा था
हर घर घर घूँघट रोता था
ग़ुलामी रग में भी उतरी थी
स्वाभिमान का सिक्का खोटा था
फिर ५७ का समर हुआ
चमकी झांसी रण अमर हुआ
कम एकसंघता के कारण
गोरा फिरभी वह प्रबल हुवा
फिरसे काला साया छाया
जुलमी गोरा शासक आया
ललकारी टिलक की गुंजी जब
वह तख्त फिरंगी घबराया
जब नमक उठाया बापू ने
गोरोंको पसीना छुटा गया
सहकार तोड तब करोडोंने
अहिंसा से रण जीत लिया
फिर चिंगारीसी जाग गई
हर सीना सीना आग गयी
न्योछावर बाबू गेनु हुआ
और वही नमक तलवार हुई
जब जला जालियन बाग तभी
दस दिशा नया विद्रोह हुवा
डर का बदला भी डर से है
कह भगत हँसते ही वीर हुआ
फिर बोस संमदर पार गये
सेनानि वो आझाद रहे
आख़िर में अगस्त की क्रांति से
अंग्रेज़ भी डरके भाग गये
जिस रात मिली थी आजादी
वह घडी है पावन आज हमें
वह त्याग धरोहर है अपना
हम भली-भाँति यह जान रहे
किंतु
चला गया वो लुट सभी
ना खाना ना तिनका था
पंजाब जला बँटवारे से
बंगाल भुक से मारा था
नेहरु ने थामी डोर तभी
जन-गण-मनसे फिर एक हुआ
तिनकोंकी आग सुलगकर ही
लोहां अपना मशहुर हुआ
आयआयटी को बनवाकर
हम ज्ञान क्षेत्र पहचान गये
अप्सरा बनाकर ५६ मे
हम आन्विक ऊर्जा जान गये
६४ में इसरो आया तब
हम चाँद की इच्छा रखने लगे
आर्यभट्ट को भेज गगन
हम कद उँचा कर चलने लगे
इंदिरा ने पूछा जगसे भी
आँखो में आँखे बात करो
टक्कर लेने से पहले तुम
बस ७१ को याद करो
लाया हमने जब कम्प्यूटर
तब आयटी में दमदार बने
विज्ञान तंत्र और ऊर्जा से
उद्योग जगत में और तनें
फिर
कारगिल का रण आया
घनघोर सिमाओं पर छाया
हम अटल रहे मजबुत सभी
नापाक भागकर पछताया
जबजब कोई हमपर टुटा
हमनें ही उसे हराया है
शांतीही हमारा उत्तर है
दुनिया को नित्य बताया है
युद्ध परें रख फिर भारत
गतिमान हुआ तुफान हुआ
अचंभित दुनिया हो बैठी
जब गणितसेही चांद्रयान हुआ
सुई से लेकर रॉकेट तक
हम आज स्वदेशी बनाते है
हरित क्रांति के बलबूते
कई देशोंको भी खिलातें है
दुनियावालों हमने भी
भारत को ब्रॅंड बनाया है
टाटा बिर्ला अंबानीने
दुनिया को रुपिया गिनाया है
है अमृत अवसर आज हमें
अब प्रण आगे यह करना है
विज्ञान समता और क्षमतासे
बस देस को ऊँचा करना है
फिर चलो बुनो नव स्वप्नोंको
जो भारत को दिव्य बनाऐंगे
हर क्षेत्र में श्रेष्ठ बनाकरही
फिर विश्वगुरू बन जाएँगें
आख़िर मैं बस यह कहता हूँ
मेरा भारत मेरा सपना
यह ‘अजय’ रहे आझाद रहे
मेरी मिट्टी के वारे ही
मेरा अंतिम कण लहु बहे
जय हिंद
-अजय निंबालकर
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