इस कठिनाई के रस्तों पर



इस कठिनाई के रस्तों पर
हम सच्चाई से चलते है

हम गिरते संवरते है
राहों से फिर भी गुज़रते है

आते है लाख भँवर भी यहाँ
दिखता है जैसे ख़ौफ़ जहाँ

विश्वास की धारा को कसकर
हम मंज़िल लाँघ ही लेते है १

ये राहें ऐसा जादू है
रुकता है वह थक जाता है
गिरकर उठता है जो भी यहां
वह अंत में जीत ही जाता है

चलना ही इसका प्रश्न यदि
चलकर उत्तर मिल जाते है
इस कठिनाई ..२

सच्चाई राह में राही को
अच्छाई से मिलवाती है
पग पग चलते जो संग सफ़र
पलमे ही पूर्ण करती  है

रखना अपने तुम यत्न अडिग
वह चरम परिक्षा लेती है

तुम जितना चलते जाते हो
वह दुगना तुमको देते  है ३ 
                         -अजय निंबाळकर

Comments

Popular posts from this blog

"संप करायाचे संस्कार"

आम्ही कशाला!!!

Shabd saath