समय

 

समय



बाती बाती जल जायेगा
सूनापन ये ढल जाएगा

हाथ पकड़ यूँ चल तू राही
काल अँधेरा कल जाएगा

साथी मेरी तू है गर जो
सूरज भोर उभर आएगा

नहीं भव्य ना सूक्ष्म समय है
रुका नहीं बस उसे अभय है

हाथ पकड़ले ऊर्जा का अब
मृत्यु ही अंतिम निर्भय है

गिनती में ही उलझे गर तू
गिनकर काल निगल जाएगा

मन ही तो तुम हो री पागल
मनमानी को पाप कहे !

पावन मन से पुण्य भी नीचा
ऊर्जा के जो संग बहे

मन मारो तो मरे समय है
मन ही अभिशाप दिलाएगा

अजय कहे समय ही ऊर्जा
ऊर्जा से ना बैर करो

बढ़ते बहते रहो प्रवाहित
मन की मानो साथ बहो

समय नहीं पूछेगा तुमसे
ना मृत्यु प्रश्न उठाएगा

बाती बाती जल जायेगा
सूनापन ये ढल जाएगा

अजय निम्बालकर







Comments

Popular posts from this blog

"संप करायाचे संस्कार"

आम्ही कशाला!!!

Shabd saath